Thursday, 29 November 2012

"बुँदे..... ओस की"
घने अंधेरे में "छुप" कर बैठी हुई
शायद सो भी गई है
भीगो कर हरियाली को
अपने "आँसुओ" से
ना जाने कहाँ "गुम" हो भी गई
प्रभात की नयी किरणों के साथ
नयी कोपलों पर
सींप के चमकते "मोतियों" की तरह
ये छोटी छोटी बुँदे "ओस" की
अपने खेल में व्यस्त है
मन मेरा भी व्याकुल है ...
साथ खेलने को इनके
मगर क्या मैं समझ पाऊँगा
"इनको"
"इनके विधान को"
रंग सातों समेटे हुए
गहराइयों में अपनी
फिर भी संघर्षरत है...
अपने अस्तित्व को हर पल
कब तक साहस दिखाएगी ...मुस्कुराएगी
और ???
दिन चढ़ने की आहट ... प्रलय बन खड़ी है
यूं ... पालक झपकते ही काही साथ ले जाएगी "इन्हे"
मैं मूक दर्शक बन खड़ा हूँ टकटकी लगाए
इनकी विदाई पर सिर्फ "मायूस" हो सकता हूँ
मगर इस बात की खुशी है अब भी
कि
यह कल फिर आएगी ....मुस्कुराएगी
अपने छुटपन को दरकिनार कर
नया सवेरा लेकर आएगी
नयी ऊर्जा और विश्वास के साथ
ये बूंदे ओस की ........

Saturday, 17 November 2012

बवंडर में घूमती ज़िंदगी 
किसका करे यकीन ?
सोचती ये ज़िंदगी 
कभी अश्क तो कभी हंसी को सहेजती संवारती
और बनावटी ज़िंदगी में खुद को खोती ज़िंदगी 

आज छल अधिक है ,विश्वास खोया सा
दिल में कितने टुकड़े ,वो लहूलुहान सा
सपनों की राख़ ले ,विसर्जित करने को जाती
हर मोड़ पे धोखा खाती ,छली जाती ज़िंदगी 

फिर भी जैसे आदत हुई जा रही उसे
चलना है तो चली जा रही है ये
मजबूर है कैसे ना करे यकीन
हर बार टूट कर बिखरती जा रही है ज़िंदगी

प्यार ,साथ ,विश्वास ,जज़्बात ,स्नेह ,अपनत्व
जैसे भौतिकता के रंग में ही रंगे जा रहे है ये तत्व
 अनमोल का लगे मोल ,ढ़ोल में है पोल
लेकिन
ज़िंदगी की ओट में ,ज़िंदगी को छुपती ,ज़िंदगी को जीए जाती
हर एक ज़िंदगी 



मन
कभी शांत ,कभी विचलित
कभी मौन ,कभी मुखरित
कभी लोभी ,कभी त्यागी
कभी सांसरिक ,कभी वैरागी
कभी गहरा ,कभी सतही
कभी प्रेमी ,कभी निष्ठुर
कभी घाघर ,कभी सागर
कभी उपवन ,कभी बंजर
कभी स्वस्थ ,कभी रोगी
कभी स्नेही ,कभी क्रोधी
कैसा है मन
असंख्य जिज्ञासायेँ, अनंत अभिलाषाएं
भावो के अनगिनत रंग ,स्वयं में समाएँ

कैसा है यह मन .......

Friday, 12 October 2012

आप कहा खो गए भगवान .........

दुर्योधन महाभारत का युद्ध छोड़ के भागा
और कहा
अब "NO MORE KILLING"
तब लोगो ने उससे पूछा
भैया WHY THE SUDDEN CHANGE IN YOUR FEELING ? "
सकुनी बोला
अरे"DUDE " !
उसका कोई दोष नहीं .
"21st CENTURY "का उसे होश नहीं
वो तो है बेचारा किस्मत का मारा
खेल गया भगवान
"POLITICS "सतयुग में भी और
पूरी दुनिया से कहा
"YUPPIE " दुर्योधन हारा ,दुर्योधन हारा
सुन कर ये
दुर्योधन को नहीं रहा कोई होश
मिट गया उसका पूरा जोश
और टल्ली हो कर बन गया वो खरगोश
तब कायर बना शायर
और कुछ ऐसा कहा गया
जो आने वाली कुछ सदियों तक
मिसाल बन गया
"कृष्ण ने जब रण छोड़ा
तो रणछोड़ नाम मिला है "
ज़रा गौर फरमाईये
"कृष्ण ने जब रण छोड़ा
तो रणछोड़ नाम मिला है "
हर "CHALLENGE " से मेरा दिल भी
बड़े जिगर से खेला है
ज़रा देख लो मेरा सर
कैसे मेहनत से गीला है
ज़रा देख लो उस की ओर
कैसे थकान से पीला है 
फिर भी
मैं करू तो साला "CHARACTER "ढीला है
माँगा जब दुयोधन ने किसन से इंसाफ
हंस कर बोले भगवान
"पहले कर अपने मन को साफ "
बोला दुयोधन
"GOD TUSSI GREAT HO "
लेकिन एक "CHANCE "तो दो
चाहे कितना भी "LATE"  हो
ना जाने वो कौन सी मनहूस घड़ी थी जब
भगवान ने कहा "तथास्तु "
और दुर्योधन आया
"21st CENTURY " में
बनकर हमारा अस्तु
कहा "GOOD BYE " दुर्योधन ने
और वादा किया 
करेंगे भविष्य में आँखे चार
जब में बनकर आऊंगा
"21st CENTURY  " का भ्रष्टाचार
अब हुआ यूँ कि
दुर्योधन ने रखा
अपने वादे का मान
आ गया वो बेशरम
चलने अपनी बाकी चाल
भ्रष्टाचार खा रहा है भारत की "आम -बान -शान

लेकिन इन सब में आप कहा खो गए भगवान .........



"just so that this poem rhymes 
let me add a few useless lines 
"god -dog "conversation ends here 
save water ,drink beer :P 



Saturday, 7 July 2012

सुकून इन्सान के जीवन का वह पल ! जिसके के लिए इन्सान अपनी पूरी जिंदगी निकाल देता है ! फिर भी इन्सान पूरी उम्र तरसता रहता हैं ,उस एक पल के सुकून के लिए !
सुकून जो होता है सिर्फ क्षणिक भर का और कुछ पलों का ! और यह पल इन्सान के जीवन मैं कब आते हैं ! और कब यह पल निकल जाते हैं ! इसका अंदाजा तो इन्सान कभी लगा ही नहीं पाता ! और फिर तैयार हो जाता है! वह सब कुछ करने के लिए जो उसे एक पल का ही सही पर सुकून दे सके !
इन्सान को सुकून कब मिलता है ! क्या कोई इन्सान है जिसने पाया हो सुकून इस दुनिया मैं ! मैं जब ढूँढने निकला तो मुझे एक भी नहीं मिला ! आज हम अपने जीवन मैं कितना भी कर लें , कुछ भी कर लें पर सुकून तो जैसे हमसे इतनी दूर है ! कि लगता है हमारा पूरा जीवन ही निकल जायेगा ! इस एक पल के सुकून को पाने मैं !

जीवन की आपाधापी मैं इन्सान आज इतना उलझा हुआ हैं ! दिनोदिन बढ़ती समस्याएं और दिन बा दिन प्रदूषित होता हमारे आस-पास का वातावरण सब कुछ इतना बड गया कि इन्सान उलझ के रह गया आज के माहौल मैं ! या यूँ भी कह सकते हैं कि इन्सान ने अपने आप को इतना व्यस्त कर लिया है ! कि वह सुकून और ख़ुशी महसूस ही नहीं कर पाता ! और वह दूर होता जाता है , अपनों से, अपने समाज से, नहीं रहता किसी का भी ध्यान ,और लग जाता कभी ना खत्म होने बाले जीवन के कार्यों मैं ! 
आज इन्सान लगा हुआ है मशीनों की तरह काम करने ! बस कभी ना रुकने बाले घोड़ों की तरह ! और नहीं है दीन-दुनिया कि खबर ! आज इन्सान ने अपने जरूरतें इतनी पैदा कर ली हैं! जिन्हें पूरा करते करते इन्सान पर बुढ़ापा तक आ जाता है फिर भी ! जरूरतें कभी पूरी नहीं होती !अपितु जरूरतें समय के साथ साथ बढ़ती जाती हैं ! 
एक समय था जब इन्सान अपने जीवन मैं सुख और सुकून का अनुभव करता था ! तब इन्सान आज की तरह आधुनिक नहीं था ! और ना ही उसकी जरूरतें ज्यादा थी ! उस वक़्त उसे चाहिए था ! रोटी -कपडा -मकान ! इन्सान के पास होता था उसका सबसे बड़ा हथियार सब्र ! जो उसे हमेशा सुकून का अनुभव कराता था ! फिर वह पल भर का ही क्यों ना हो ! तभी तो आज के कई बुजुर्ग यह कहते हैं ! कि समय तो हमारा था ! जिसमें इन्सान के पास सब कुछ था ! और रहते थे सुकून से ! जितनी चादर उतना ही पैर फैलाता था ! और उठाता था जीवन मैं सुकून का आनंद !
लेकिन आज के माहौल मैं उसे यह सब कुछ देखने को नहीं मिलता ! 

अगर जीवन मैं पाना है सुकून और सुख की अनुभूति ! तो जुड़े रहिये अपने परिवार के साथ, जुड़े रहिये अपने समाज के साथ ! ना दौड़ें आधुनिकता की तरफ अंधों की तरह ! 
आज इन्सान के शौक इतने हो गए हैं ! की वह जीवन भर उन्हें पूरा नहीं कर सकता ! इच्छाएं तो अन्नंत हैं ,जिनका कोई अंत नहीं ,और सुकून होता है पल भर का ,तो उस पल को महसूस करें , 
ज़िंदगी को जीएं ,काटे नहीं

Wednesday, 4 July 2012

ज़िंदगी तेरी हकीकत से कुछ
 यूं बेखबर रहा हूँ
मंज़िल की तलाश में हमेशा  दर -ब -दर भटक रहा हूँ
ज़िंदगी
जाने किस राह किस मोड पर
तू हम पर मेहरबान हो
तू तो कभी ना हो पाई मेरी
पर हमेशा तेरा हमसफर रहा हूँ मैं
अजीब है यह खेल लकीरों का
टूट कर आईने की तरह बिखर रहा हूँ मैं
हालात के डर से कभी दो कदम भी ना चल सका
वक़्त के खौफ से हमेशा अपने घर में रहा हूँ मैं
मुश्किल राहों पर तन्हा चलता गया
हर दौर से कुछ युही गुज़र रहा हूँ मैं
परख रहा हूँ आज अपने और गैरो को
हर रिश्ते में कुछ यू ढल रहा हूँ मैं
इंसान हूँ मैं भी ,मैं भी दिल रखता हूँ
चोट खाकर फिर भी बस चल रहा हूँ मैं
ख़्वाहिश तो एक बूंद अश्क की तरह है
जिसने पलकों पर अपना घर बना लिया है
पर धीरे धीरे उन पलकों से उतर रहा हूँ मैं
सिर्फ चलना ही अगर ज़िंदगी है
तो हाँ बस चल रहा हूँ मैं


सिर्फ चिल्लाने से देश नहीं बदलेगा ,अपने अधिकारो का इस्तेमाल करे ।

लोकतन्त्र यानि "जनता के द्वारा जनता के लिए "
मतदाता ही लोकतन्त्र के मालिक है ॥ पर परिस्थितिया बदल गयी है ... जनता के द्वारा चुने लोग आज जनता का ही शोषण कर रहे है ॥ लोकतन्त्र सिर्फ नाम मात्र है , वर्तमान सरकार तानाशाही बन चुकी है ॥

अक्सर ऐसा होता है कि आजकल अपराधिक गतिविधियों से जुड़े लोग चुनाव के अखाड़े में होते है , वो अपने गैर कानूनी धंधे चलाने के लिए राजनीति को मोहरा बनाते है , जनता के सामने विकल्प है पर जानकारी नहीं उस विकल्प की .... पैसो के लालच या डर की वजह से वो किसी एक को वोट देने पर मजबूर होते है ॥
सरकार जागरूकता अभियान चलती है कि हर नागरिक अपने वोट का जरूर उपयोग करे , होने भी चाहिए ऐसे अभियान

पर सरकार जनता को इस बात से जागरूक नहीं करती कि जनता के पास सबको खारिज करने का अधिकार भी है । कोई  प्रत्यासी आपको पसंद नहीं है ,आपको लगता है कि उनमे से कोई भी जीतेगा तो जनता का शोषण होगा तो उन सब प्रत्यासियों को खारिज कर सकते है ।

पर सरकार इसे जनता तक नहीं पहुँचती ।

चुनाव कराने सम्बन्धित अधिनियम की धारा 49 (O) के तहत भारतीय मतदाता को यह भी अधिकार दिया गया है कि यदि वह समझता है कि कोई भी प्रत्याशी उपयुक्त नहीं है तो वह अपना मत किसी को न दे और इस बात को प्रारूप 17 A पर दर्ज कराए. यानी भारतीय नागरिक को मत देने के अधिकार के साथ-साथ मत न देने का भी अधिकार दिया गया है.

इस अधिकार का उपयोग कर हम एक जिम्मेदार और कर्तव्यनिष्ठ जनप्रतिनिधि का चयन कर सकते है ..

बहुत ही साधारण है

आप अपने पोलिंग बूथ पर जाए और चुनाव अधिकारी से मांग करे  "मैं किसी को वोट नहीं करना चाहता प्रारूप 17  उपलब्ध कराएं "

कल्पना करें कि सबसे ज्यादा मत पाने वाले उम्मीदवार से ज्यादा मतदाता सभी उम्मीदवारों को खारिज करने का विकल्प चुनते हैं. सैद्धांतिक रूप से इसका अर्थ होगा कि उस चुनाव क्षेत्र में ज्यादा मतदाता यही समझते हैं कि कोई उम्मीदवार चुना जाने लायक नहीं है. ऐसी दशा में चुनाव रद्द करा कर फिर से कराए जाने चाहिए, जिसमें पिछली बार खड़ा कोई भी प्रत्याशी पुनः खड़ा न हो.

यही बात राजनीतिक दलों के लिए खतरे की बात है. कहीं ऐसा न हो कि बड़े पैमाने पर जनता राजनीतिक दलों व उनके उम्मीदवारों को खारिज करना शुरू कर दे. अधिकारी भी अभी वर्तमान व्यवस्था के बदलाव के पक्ष में नहीं हैं. उनका निहित स्वार्थ इसी में है कि वर्तमान समय में मौजूद भ्रष्ट व्यवस्था ही कायम रहे. इसका प्रमाण है मतदान कराने हेतु जिम्मेदार अधिकारियों- कर्मचारियों का मतदाता के प्रति रवैया.

यह बड़ी अजीब बात है कि मतदाता जागरूकता को तो अच्छा समझा जाता है. लेकिन क्या मतदाता जागरूकता इतना भर है कि हम घर से निकल कर किसी को भी मतदान कर आएं? अधिकारियों को अभी यह लगता है यदि कोई मतदाता धारा 49 (ओ) के तहत अपने अधिकार का इस्तेमाल करना चाहे तो उनका काम बढ़ जाएगा.

मत देना तो जागरूक मतदाता की पहचान है लेकिन यदि आप किसी को मत न देने का अधिकार इस्तेमाल करना चाहें तो ऐसी टिप्पणी की जाती है कि क्या सबसे ज्यादा जागरूक आप ही हैं? या फिर यह कहा जाता है कि किसी को मत नहीं देना है तो यहां आए ही क्यों हो? इससे तो अच्छा होता कि घर बैठते. अधिकारियों की सोच इस मामले में अभी मतदाता के प्रति नकारात्मक है.

भ्रष्ट एवं आपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों को चुनाव के मैदान से बाहर करने का यह बहुत कारगर औजार हो सकता है. यदि जनता तय कर ले कि सभी अवांछनीय लोगों को चुनाव लड़ने से रोका जाए तो बड़े पैमाने पर लोग सभी उम्मीदवारों को खारिज करने के अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं. और राजनीतिक दल भी फिर इस डर से कि कहीं जनता उनके उम्मीदवारों को नकार न दे सही किस्म के लोगों को उम्मीदवार बनाना शुरू करेंगे.

अभी तो उनको मालूम है कि जनता की मजबूरी है कि उसे उन्हीं में से किसी एक को चुनना है. इसलिए दल जनता की भावना को धता बताते हुए भ्रष्ट एवं अपाराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को ही उम्मीदवार बनाते हैं.

दूसरा यह नियम बनाना कि यदि सबसे ज्यादा मत पाए उम्मीदवार से भी ज्यादा लोग सभी उम्मीदवारों को खारिज करने वाला बटन दबाते हैं तो चुनाव रद्द कर पुनः नए उम्मीदवारों के साथ मतदान कराना जिसमें पिछली बार खड़े प्रत्याशियों पर प्रतिबंध हो. इस प्रकिया से जनता अंततः सही उम्मीदवार को चुन लेगी और तमाम अवांछनीय प्रत्याशी खारिज कर दिए जाएंगे.

तो खुद भी जागे और औरों को भी जागरूक करे ॥ यह एक महत्वपूर्ण कदम होगा देश में भ्रष्टाचार ,अन्याय और भ्रष्ट व्यवस्था से निजात दिलाने के लिए ...