Tuesday, 22 September 2015

भटकते युवाओं का दोष किसको ?

युवा किसी भी समाज के कर्णधार हैं, वे उसके भावी निर्माता हैं। चाहे वह नेता या शासक के रूप में हों , चाहे डॉक्टर, इन्जीनियर, वैज्ञानिक, साहित्यकार व कलाकार के रूप में हों। इन सभी रूपों में उनके ऊपर अपनी सभ्यता, संस्कृति, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को मानवीय संवेदनाओं के साथ आगे ले जाने का गहरा दायित्व होता है। पर इसके विपरीत अगर वही युवा वर्ग उन परम्परागत विरासतों का वाहक बनने से इनकार कर दे तो निश्चिततः किसी भी राष्ट्र का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।

युवा शब्द अपने आप में ही उर्जा और आन्दोलन का प्रतीक है। युवा को किसी राष्ट्र की नीव तो नहीं कहा जा सकता पर यह वह दीवार अवश्य है जिस पर राष्ट्र की भावी छतों को सम्हालने का दायित्व है। जब तक यह ऊर्जा और आन्दोलन सकारात्मक रूप में है तब तक तो ठीक है, पर ज्यों ही इसका नकारात्मक रूप में इस्तेमाल होने लगता है वह विध्वंसात्मक बन जाती है। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि आखिर किन कारणों से युवा उर्जा का सकारात्मक इस्तेमाल नहीं हो पा रहा है? वस्तुतः इसके पीछे जहाँ एक ओर अपनी संस्कृति और जीवन मूल्यों से दूर हटना है, वहीं दूसरी तरफ हमारी शिक्षा व्यवस्था का भी दोष है। इन सब के बीच आज का युवा अपने को असुरक्षित महसूस करता है, फलस्वरूप वह शार्टकट तरीकों से लम्बी दूरी की दौड़ लगाना चाहता है। जीवन के सारे मूल्यों के उपर उसे ‘अर्थ‘ भारी नजर आता है।

फिल्मी परदे और अपराध की दुनिया के नायकों की भांति वह रातों-रात उस शोहरत और मंजिल को पा लेना चाहता है, जो सिर्फ एक मृगण्तृष्णा है। ऐसे में एक तो उम्र का दोष, उस पर व्यवस्था की विसंगतियाँ, सार्वजनिक जीवन में आदर्श नेतृत्व का अभाव एवम् नैतिक मूल्यों का अवमूल्यन ये सारी बातें मिलकर युवाओं को कुण्ठाग्रस्त एवम् भटकाव की ओर ले जाती हैं, नतीजन-अपराध, शोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी एवम् भ्रष्टाचार जैसी समस्याएँ जन्म लेती हैं।

भारतीय संस्कृति ने समग्र विश्व को धर्म, कर्म, त्याग, ज्ञान, सदाचार और मानवता की भावना सिखाई है। सामाजिक मूल्यों के रक्षार्थ वर्णाश्रम व्यवस्था, संयुक्त परिवार, पुरूषार्थ एवम् गुरूकुल प्रणाली की नींव रखी। भारतीय संस्कृति की एक अन्य विशेषता समन्वय व सौहार्द्र रहा है, जबकि अन्य संस्कृतियाँ आत्म केन्द्रित रही हैं। इसी कारण भारतीय दर्शन आत्मदर्शन के साथ-साथ परमात्मा दर्शन का भी पर्मार्थता कराता हैं।

औद्योगीकरण, नगरीकरण और अन्ततः पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव ने भारतीय संस्कृति पर काफी प्रभाव डाला। निश्चिततः इन सबका असर युवा वर्ग पर भी पड़ा है। आर्थिक उदारीकरण और भूमण्डलीकरण के बाद तो युवा वर्ग के विचार-व्यवहार में काफी तेजी से परिवर्तन आया है।
बाजारी लाभ की अन्धी दौड़ और उपभोक्तावादी विचारधारा के अन्धानुकरण ने उसे ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा और शार्टकट के गर्त में धकेल दिया। कभी विद्या, श्रम, चरित्रबल और व्यवहारिकता को सफलता के मानदण्ड माना जाता था पर आज सफलता की परिभाषा ही बदल गयी है।

आज का युवा अपने सामाजिक उत्तरदायित्वों से परे सिर्फ आर्थिक उत्तरदायित्वों की ही चिन्ता करता है। युवाओं को प्रभावित करने में फिल्मी दुनिया और विज्ञापनों का काफी बड़ा हाथ रहा है पर इनके सकारात्मक तत्वों की बजाय नकारात्मक तत्वों ने ही युवाओं को ज्यादा प्रभावित किया है।

शिक्षा एक व्यवसाय नहीं ,संस्कार है, पर जब हम आज की शिक्षा व्यवस्था देखते है तो यह व्यवसाय ही ज्यादा ही नजर आती है। युवा वर्ग स्कूल व काॅलेजों के माध्यम से ही दुनिया को देखने की नजर पाता है,
पर
शिक्षा में सामाजिक और नैतिक मूल्यों का अभाव होने के कारण वह न तो उपयोगी प्रतीत होती है व न ही युवा वर्ग इसमें कोई खास रूचि लेता है। अतः शिक्षा मात्र डिग्री प्राप्त करने का गोरखधंधा बन कर रह गयी है। पहले शिक्षा के प्रसार को सरस्वती की पूजा समझा जाता था, फिर जीवन मूल्य, फिर किताबी और अन्ततः इसका सीधा सरोकार मात्र रोजगार से जुड़ गया है। ऐसे में शिक्षा की व्यवहारिक उपयोगिता पर प्रश्नचिन्ह लगने लगा है। शिक्षा संस्थानों में प्रवेश का उद्देश्य डिग्री लेकर अहम् सन्तुष्टि तक रह गया है ।
शिक्षा में सामाजिक और नैतिक मूल्यों के अभाव ने युवाओं को नैतिक मूल्यों के सरेआम उल्लंघन की ओर अग्रसर किया है, मसलन-मादक द्रव्यों व धूम्रपान की आदतें, यौन-शुचिता का अभाव, काॅलेज को विद्या स्थल की बजाय फैशन ग्राउण्ड की शरणस्थली बना दिया है। दुर्भाग्य से आज के गुरूजन भी प्रभावी रूप में सामाजिक और नैतिक मूल्यों को स्थापित करने में असफल रहे हैं।

आज के युवा को सबसे ज्यादा राजनीति ने प्रभावित किया है पर राजनीति भी आज पदों की दौड़ तक ही सीमित रह गयी है। राजनीति के शीर्ष पर बैठे नेताओं ने युवाओं का उपयोग सिर्फ मोहरों के रूप में किया। विचारधारा के अनुयायियों की बजाय व्यक्ति की चापलूसी को महत्ता दी गयी।
अवसरवाद की राजनीति ने युवाओं को हिंसा भड़काने, हड़ताल व प्रदर्शनों में आगे करके उनकी भावनाओं को भड़काने और स्वंय सत्ता पर काबिज होकर युवा पीढ़ी को गुमराह किया है।

आदर्श नेतृत्व ही युवाओं को सही दिशा दिखा सकता है, पर जब नेतृत्व ही भ्रष्ट हो तो युवाओं का क्या? किसी दौर में युवाओं के आदर्श गाँधी, विवेकानन्द, आजाद जैसे लोग या उनके आसपास के सफल व्यक्ति, वैज्ञानिक और शिक्षक रहे।
पर
आज के युवाओं के आदर्श वही हैं, जो शार्टकट के माध्यम से ऊँचाइयों पर पहुँच जाते हैं। फिल्मी अभिनेता, अभिनेत्रियाँ, विश्व-सुन्दरियाँ, भ्रष्ट अधिकारी, अपराध जगत के डाॅन, उद्योगपति और राजनीतिज्ञ लोग उनके आदर्श बन गये है।
कभी विवेकानन्द जैसे व्यक्तित्व ने युवा कर्मठता का ज्ञान दिया तो सन् 1977 में लोकनायक के आहृान पर सारे देश के युवा एक होकर सड़को पर निकल आये पर आज वही युवा अपनी आन्तरिक शक्ति को भूलकर चन्द लोगों के हाथों का खिलौना बन गये है
आज का युवा संक्रमण काल से गुजर रहा है। वह अपने बलबूते आगे तो बढ़ना चाहता है, पर परिस्थितियाँ और समाज उसका साथ नहीं देते। चाहे वह राजनीति हो, शिक्षा हो, उच्च नेतृत्व हो- हर किसी ने उसे सुखद जीवन के सब्ज-बाग दिखाये और फिर उसको भँवर में छोड़ दिया।
ऐसे में पीढ़ियों के बीच जनरेशन गैप भी बढ़ा है। समाज की कथनी-करनी में भी जमीन आसमान का अन्तर है। एक तरफ वह सभी को डिग्रीधारी देखना चाहता है, पर धन की लालसा ऐसी कि शिक्षा से ज्यादा महत्त्व पैसे को दिया जाता ।
पद की लालसा जैसी चीजों ने युवा हृदय को झकझोर दिया है। जब वह देखता है कि योग्यता और ईमानदारी से कार्य सम्भव नहीं, तो कुण्ठाग्रस्त होकर गलत रास्तों पर चल पड़ता है। निश्चिततः ऐसे में ही समाज के दुश्मन उनकी भावनाओं को भड़काकर व्यवस्था के विरूद्ध विद्रोह के लिए प्रेरित करते है।

इसमें कोई शक नहीं कि युवा वर्ग ही भावी समाज की आधारशिला रखता है, पर दुःख तब होता है जब समाज युवाओं में भटकाव हेतु युवाओं को ही दोषी ठहराता है। क्या समाज की युवाओं के प्रति कोई जिम्मेदारी नहीं? जिम्मेदार पदों पर बैठे व्यक्ति जब सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों का सरेआम क्षरण करते नजर आते हैं, तो फिर युवाओं को ही दोष क्यों?

युवाओं ने आरम्भ से ही इस समाज व देश के आन्दोलनों में रचनात्मक भूमिका निभाई है- चाहे वह समाजिक, शैक्षणिक, राजनैतिक या सांस्कृतिक हो। लेकिन आज युवा आन्दोलनों के पीछे किन्हीं सार्थक उद्देश्यों का अभाव दिखता है। युवा आज उद्देश्यहीनता और दिशाहीनता से ग्रस्त है, ऐसे में कोई शक नहीं कि यदि समय रहते युवा वर्ग को उचित दिशा नहीं मिली तो समाज का अहित होने एवम् अव्यवस्था फैलने की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
युवा व्यवहार मूलतः एक शैक्षणिक, सामाजिक, संरचनात्मक और मूल्यपरक समस्या है जिसके लिए राजनैतिक, सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक सभी कारक जिम्मेदार हैं। ऐसे में समाज के अन्य वर्गों को भी जिम्मेदारियों का अहसास होना चाहिए, सिर्फ युवाओं को दोष देने से कुछ नहीं होगा, क्योंकि सवाल सिर्फ युवा शक्ति के भटकाव का नहीं है, वरन् अपनी संस्कृति, सभ्यता, मूल्यों, कला एवम् ज्ञान की परम्पराओं को भावी पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने का भी है। युवाओं को भी ध्यान देना होगा कि कहीं उनका उपयोग सिर्फ मोहरों के रूप में न किया जाय।

Thursday, 3 September 2015

इंटरनेट क्रांति का कदम भारत की ओर ...संभव

इंटरनेट के ग्लोबल गवर्नेंस में भारत ने बड़ी भूमिका निभाने का दावा पेश किया है। भारत ने अमेरिका से कहा है कि वह यहां एक 'रूट सर्वर' लगाए।
दुनिया में ऐसे केवल 13 सर्वर हैं। इसमें से 10 अमेरिका में, दो यूरोप और एक जापान में है। भारतीय अधिकारियों ने ईटी को बताया कि अमेरिका ने भारत के अनुरोध पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।
रूट सर्वर इंटरनेट का आधार माना जाता है। ये रीडेबल होस्ट नेम को आईपी ऐड्रेस में ट्रांसलेट करता है, जिससे यूजर को सही पोर्टल लिंक मिलता है। रूट सर्वर्स के मिरर सर्वर्स भी होते हैं। ऐसे छह मिरर सर्वर भारत में हैं। इंटरनेट ऐड्रेस में बदलाव होने पर वह रूट सर्वर में खुद ब खुद अपडेट हो जाता है। किसी भी सर्वर पर हुआ बदलाव ऑटोमैटिकली दूसरे रूट सर्वर्स पर अपडेट हो जाता है।
सीनियर अधिकारियों ने ईटी को बताया कि भारत ने दो सप्ताह पहले इंडो-अमेरिका साइबर डायलॉग के दौरान यह अनुरोध किया था। अभी अमेरिका में 10 में से अधिकतर रूट सर्वर नासा, मिलिट्री रिसर्च लैब्स और यूनिवर्सिटीज में हैं।
अधिकारियों ने बताया कि अमेरिका ने भारत से कहा कि वह इस संबंध में इंटरनेट कॉरपोरेशन फॉर एसाइंड नेम्स एंड नंबर्स के साथ बातचीत शुरू करे। हालांकि उसने यह भी कहा कि ऐसा निर्णय तभी संभव हो सकता है, जब 14वां रूट सर्वर लगाने का कदम उठाया जाए। दूसरी ओर, भारत का मानना है कि 13 में से किसी एक सर्वर को रीलोकेट करना भी भारत की लोकतांत्रिक साख पर बड़े भरोसे का प्रतीक होगा। अभी इंडिया में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा इंटरनेट यूज बेस है।
अधिकारियों ने बताया कि रूट सर्वर से इंटरनेट गवर्नेंस के ढांचे में भारत का दबदबा बढ़ेगा और देश में तकनीकी क्षेत्र में बड़ी प्रगति होगी।
अमेरिकी अधिकारियों के साथ मीटिंग में भारत ने यह मुद्दा भी उठाया कि उसके अनुरोधों पर वॉट्सऐप और फेसबुक जैसी अमेरिकी इंटरनेट कंपनियां तेजी से कदम नहीं उठाती हैं। इस संबंध में खासतौर से मुजफ्फरनगर दंगों का हवाला दिया गया, जहां वॉट्सऐप के जरिए एक भड़काऊ यूट्यूब वीडियो वायरल हो गया था। इससे कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर स्थिति बन गई थी। भारतीय सिक्योरिटी एजेंसियों ने शिकायत की थी कि वॉट्सऐप के मैनेजरों से सहयोग न मिलने के कारण वे उस वीडियो को ब्लॉक नहीं कर सकीं।
अमेरिका ने इस मुद्दे पर ध्यान देने की बात तो कही, लेकिन प्राइवेट कंपनियों से अपनी बात मनवाने में दिक्कतों का हवाला भी दे डाला।
:-NBT

Wednesday, 2 September 2015

हड़ताल ! ... मकसद क्या ?



हड़ताल .... STRIKE

अपने हक़ के लिए ...या... अपनी बात मनवाने के लिए ...

क्या अपना हक़ पाने के लिए यही एकमात्र उपाय है ?
हड़ताल...... सरकारी नीतियों का विरोध करना ।

वैसे हड़ताल की परिभाषा क्या है सही मायने में और होता क्या है ...
वैसे आज के दौर की हड़ताल ...

चंद सामाजिक या राजनितिक ठेकेदारों द्वारा मामूली भीड़ जुटा कर रोड पर चिल्लाते रहना,
और
जनता के द्वारा जनता को परेशान करना मात्र हड़ताल है ।

किसका भला होता ? क्या भला होता ?

उसी सन्दर्भ में

किसका नुकसान होता ? कितना नुकसान होता ?

हड़तालियों का मोटो
भला किसी का हो या ना हो मगर नुकसान करो ताकि कुछ निजी स्वार्थ पूरा हो जाए ।
कुछ लोग निम्न स्तर के राजनितिक दल्ले जो अपना राजनितिक ग्राउंड बनाने के लिए दिखावे के लीडर बनते है बिन विवेक के लोगो के ।
चंद लोगो द्वारा आर्गनाइज्ड हड़ताल में कुछ लफंगे लोगो की भीड़ होती है ... वास्तव में आम जन कोई नहीं .... सिवाय भाड़े के टट्टुओं के ...

चंद लोगो का हड़ताल से मकसद सिर्फ Blackmailing है ... सत्ता पक्ष से कुछ मांग तांग कर जेबे भर कर चले जाते और भीड़ को खोटे सिक्को से बहला देते ।

हड़ताल सदियों से होती आई है ... तब अथाह जनसमूह होता था समस्य सबकी हुआ करती थी सब साथ में हमला करते थे । तब जाँत-पाँत के आधार पर हड़ताल नहीं हुआ करती थी ... वाकई में समस्याओं के समाधान के लिए ना कि Blackmailing

कुछ दिनों से हार्दिक पटेल जो cheap publicity के लिए भीड़ जुटा रहा है (हालाँकि भीड़ जुटाने का काम हार्दिक को चेहरा बना कर राजनीति करने वाले करते है)

यही नज़ारा आज की ट्रेड यूनियन की हड़ताल में देखा ...चंद लोग बारी बारी से फ़ोटो खिचवा रहे थे ...

छलावा हो रहा जनता के साथ मगर जनता भी मुर्ख ख़ुशी से छलावे को स्वीकार कर रही ।

और आज मजदुर यूनियन की हड़ताल
क्या मिलता इनको हड़ताल करने से ...सिर्फ जनता परेशान होती है ।
हाँ हड़ताल तब सफल होती जब सम्पूर्ण आम जन एक साथ हो

5 लाख की आबादी में 300 जने हड़ताल करते ... यानि 499700 लोगो को किसी से कोई शिकायत नहीं पर सिर्फ 300 लोगो को हो रही है ... उन 300 के 3 लीडर होते है जो Blackmailing का धंधा (हड़ताल) करते है ... कुछ ठूस ठास कर दोपहर तक भीड़ तितर बितर हो जाती ...

ऐसे लोगो के लिए किसानों की मौत या कुछ अनर्थ होना मसाले से कम नहीं ... ये लोग ऐसे मौको को भुनाने में लगे रहते है ।

पर यह निश्चित है कि इन ठेकेदारों की पीड़ित लोगो के प्रति कोई हमदर्दी रहती ।

यहाँ पर भी लोगो को " स्वविवेक " से सोचना होगा ।
कि किन लोगो के क्या मकसद से हम किन के समर्थन में उतरे है ... पर दुर्भाग्य .... भेड़ बकरिये की तरह चल पड़ते किसी राजनितिक गड़रिये के पीछे ।

आज देश की करीब आधी आबादी गरीबी रेखा से निचे (वजह गन्दी राजनीति और पॉलिटिशियन के निजी स्वार्थो के कारण)
इस आबादी की दशा और दिशा "ठेकेदार" करते है

फिर भले धर्म के ठेकेदार हो
सामाजिक ठेकेदार हो
या राजनितिक ठेकेदार

जनता सब जानती भी है ... मगर स्वाभिमान को गहरी नींद सुला दिया ।

आम जन हो सकता एक - जब हो स्वविवेक
जय हिन्द ।।  

Tuesday, 1 September 2015

POK मोदी के सुशासन का मुरीद

पाकिस्तान से आजाद होना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि इसकी सबसे बड़ी वजह मोदी की नीति है, जिसके चलते वहां के लोग उनके मुरीद हो गए हैं।
अपने पांच दिन के कश्मीर दौरे से लौटे मौलाना दहलवी ने कहा कि कश्मीर में पीएम मोदी ने जिस तरह से बाढ़ पीडितों की मदद की वह तारीफ के काबिल है। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में जब कश्मीर डूब रहा था उस वक्त भारतीय फौज उनके लिए देवदूत बनकर सामने आई और लोगों काे हर संभव मदद दी। उन्होंने कहा कि पीएम मोदी का बेहतर प्रशासन और जम्मू कश्मीर के प्रति उनका नजरिया दोनों ही दूसरों से बेहतर हैं।
मौलाना ने कहा कि मोदी की सुशासन देने की अपील का पीओके में जबरदस्त स्वागत किया गया है। यही वजह है कि वह पाकिस्तान से नाता तोड़कर भारत में शामिल होना चाहते हैं। उन्होंने पाकिस्तान पर आरोप लगाया कि वह लगातार हिमालय के क्षेत्र को अपनी कलोनी के तौर पर बताता आया है। लेकिन अब पीओके के लोग इसको मानने के लिए तैयार नहीं है। प्रेस वार्ता के दौराना उन्होंने कश्मीर के अलगाववादी नेताओं पर भी जमकर भड़ास निकाली। उन्होंने कहा कि उनका वहां कोई वजूद नहीं है और उनकी राजनीतिक जमीन खत्म हो चुकी है।
साभार:- भास्कर 

"फांसी " के कानून को फांसी ..

फांसी .... मौत ..... एक भयानक दृश्य उभरता आँखों के सामने ... सहमे से महसूस करते ।।
वैसे अन्य देशों के मुकाबले भारत के कानून बहुत लचीले है ..किसी को फायदा मिलता है .. बहुत लोग फायदा उठाते है । कानून की मार के कोड़े गरीब पर पड़ते तब चमड़ी उधड़ती है और अमीर पर पड़े तब सिर्फ "मार्क" छपते है ..

देश का युथ भी गज़ब है ... कहते कानून बनते ही तोड़ने के लिए ...
सही है ... अनुशासन की भावना दिल में होनी चाहिए ... कानून का डर कुछ हद तक अनुशासन मेंटेन कर सकता बाकि कानून की हवा हार्दिक पटेल जैसे युवा शौक शौक में निकाल देते है ।

खैर विषय ज्यादा लंबा ना खीचते हुए ...
लॉ कमीशन ने "फांसी " की सजा आतंकवादियों व देशद्रोहियों के लिए होनी चाहिए ।
सही निर्णय पर घरेलु क्रूर अपराधियों को भी बख्सा नहीं जाना चाहिए ।
सबके अपने अपने नज़रिये है ....

मौत की सजा नया प्रावधान नहीं है ... युगों से चल रही एक न्यायिक प्रक्रिया है ...
जैसा अपराध वैसी सजा का प्रावधान सही है ।

फांसी की सजा से भी क्रूर सजाएँ हुआ करती थी ... पर बीते हुए कल से आज बहुत बेहतर है ...
एक हिसाब से फांसी की सजा को मानवीयता के नाते बंद करना सही है पर तब मानवीयता कहाँ जाती जब अपराधी न घिनोने कृत्य  किये थे ?

सीमा पर कोई आतंकवादी जिन्दा पकड़ा जाता है , पूछताछ होती है ... मानवीयता के नाम पर वकील कोर्ट में उसकी पैरवी करता है और जज द्वारा सजा का ऐलान होता है
मुल्जिम को उम्र कैद की सजा दी जाती है ...

चलो चेप्टर क्लोज .... क्योकि इसके उपरांत कोई सजा भी तो नहीं ...
क्या करेगा अपराधी .... जेल में रहेगा ताउम्र ...
क्या गम ..... आतंकी बना क्योकि गरीब था ,,, खाने के लाले पड़ रहे थे ... सोचा जो भी काम है पेट की खातिर करना ही पड़ेगा ....
 भूख मिटाने के लिए जब सब रास्ते बंद हो जाते (स्वविवेक खो दिया )तब इंसान नरभक्षी भी बन सकता है ।

क्या फर्क पड़ा ? क्या असर हुआ ?
जो पेट की खातिर आतंकी बना उसको ताउम्र जेल में रखा जायेगा ,पौष्टिक खाना मिलेगा ,सरल काम करेगा, सुकून की नींद सोयेगा ... क्योकि इससे बुरा उस आतंकी के साथ हो ही नहीं सकता भले उसने खुद के साथ हुए बुरे ऐ कई गुना बुरा काम किया हो ...

हिंदुस्तान उन आतंकी भेडियो को पलेगा और पाकिस्तान आतंक के भेड़ियों की नस्ल को बढ़ाता रहेगा ।
 आतंकी आका पाकिस्तान के गरीबों को बंदूको की घड़ाइ से आतंकी बनाते है ... और भेज देते है भारत में ... मिशन पर ..... जवाबी करवाई में मारे जाते तो कोई गम नहीं ... जिन्दा पकड़े गए तो सोने पे सुहाग ... ज़िन्दगी भर मुफ़्त की रोटिया तोड़ेंगे ।

हिन्दुस्थान के क्रूर अपराधियों को भी फांसी होनी चाहिए ... ऐसे लोग जेल में रहकर भी अपनी गतिविधिया जारी रखते है ।।
लचीले कानून के साथ कुछ अतिकठोर कानून भी आवश्यक है ।
जय हिन्द 

मीडिया की दौड़ औरंगजेब रोड़ से कलाम मार्ग तक

औरंगजेब रोड को आदरणीय कलाम साहब का नाम देने पर कई चैनलों का रोना
सर्वे के अनुसार 87% लोगो ने इस फैसले को सही माना ... पर
जनता को आपत्ति नहीं पर मीडिया हर जगह नकारात्मकता फैला रहा है ।
मैंने कई पत्रकारों के विश्लेषण देखे maximum पत्रकार सरकारों के फैसले पर नकारात्मक प्रतिक्रिया फैलाते ...
इस देश के बद्दतर हालात में देश का चौथा स्तम्भ (झूठा) कहे जाने वाले मीडिया का बहुत बड़ा रोल है ..
इस तरह की ख़बरों पर फोकस करने की बजाय देश के असली हालातों से रूबरू करवाते रहे तो बहुत कुछ बदल सकता ।
कोई मीडिया चैनल गावों की स्पष्ट तस्वीर देश की जनता के सामने प्रस्तुत नहीं करते ।
मैं सभी मीडिया चैनल से कहूँगा
लगे हाथ देश की जनता से इस बाबत भी वोटिंग करवा लीजिये कि जनता का देश के चैनलों पर कितना "भरोसा" है , क्या वाकई में मीडिया चौथे स्तम्भ की भूमिका निभा रहा है (दलाली से फुरसत मिले तब न , )
मीडिया को जन सेवा का आधार माना जाता मगर मीडिया ने इसको धंधा बना दिया ,
करोड़ों की ठूस रहे ।
रहे कुछ (नगण्य) ईमानदार पत्रकार तो उनको धमकिया या हत्या तक हो जाती ...
जहाँ ऑफिस बनाते उसके आस पास की खबरों को ज्यादा तवज्जो देते है ...
हाँ प्रिंटिंग मीडिया कुछ कुछ मेहनत करता है गावों की नब्ज टटोलने की ...
प्रिंटिंग मीडिया के पत्रकार इतने हाई प्रोफाइल नहीं जितने इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार है
(करोडो छापते है साहब ) ...
इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को जब कोई एक खबर (मसाला खबर जिससे लोगो को उकसाया जा सके ..... लोगो को इंसाफ ,,,न्याय दिलाने के नाम पर)
उन मुद्दों को खिचता जायेंगे कई दिनों तक ...
TRD साहब TRP ...
मीडिया .... लोग क्या देखना चाहते है और मीडिया को वाकई में क्या दिखाना चाहिए ..... इससे उनको कोई मतलब नहीं .... सिर्फ .... फलाना चैनल ढीमके चैनल की खबर को फॉलो करके वही ढर्रे पर चलेगा और ढिमका चैनल भी वैसा ही ....
जय हो ....

Tuesday, 30 September 2014

एक सफर मेरा....

एक सफर मेरा....
यात्रा
#official_trip

मुल्लायांगिरी पर्वत श्रेणियों की तलहटी और कर्नाटक के दक्षिण पश्चिम में बसा एक सुंदर शहर कडुर ,जो आज  #चिकमगलूर के नाम से जाना जाता है इस जिले को "मलेनाडु "(मले = वर्षा ,नाडु =प्रदेश ) (भरी वर्षा का क्षेत्र ) कहा जाता है ।
इसी प्रदेश से जल प्रवाह होकर दक्षिण भारत की नदियां #तुंगा और #भाद्र का उद्गम होता है ।  
वहाँ पर सभी धर्मों की पूजनीय समाधियाँ हैं - कोदंडराम मंदिर जो कीहोयसल और द्रविड़ वास्तुशास्त्र शैली का मिलाप माना जाता हैजामिया मस्जिद तथा न्यू सेंट जोसेफ कैथेड्रल जिस का बरामदा आकर्षक सीप की आकार में बनाया गया है।

चारों ओर चिकमगलूर हिल स्टेशंस जो गर्मियों की छुट्टियाँ बिताने के लिए प्रसिद्ध स्थल है क्यों कि के वे गर्मियों के दौरान भी शीतल रहते हैं।
रत्नागिरी बोरे (जो आज महात्मा गांधी उध्यान से जाना जाता ) यहा की प्रकृतिक सुंदरता का एक भाग है
अच्छे कॉलेज और स्कूल ,शिक्षा का महत्वपूर्ण स्थान है चिकमगलूर ।

भारत में सबसे पहले कॉफी का उत्पादन इस(चिकमगलूर)  जिले में हुआ ।

सफर शुरू हुआ .....
चिकमगलूर से मंगलोर का
लगभग 150 किलोमीटर की दूरी
चिकमगलूर का दृश्य देखते ही लगता है हम स्वर्ग में विचरण कर रहे है ।
बहुत ही सुंदर शहर चरो और हरियाली ,बादलों से गिरे पर्वत ,कॉफी के बागान और धूप में भी ठंडा सुहाना मौसम ।
सुबह बस स्थानक पहुंचा नहा धो कर काम पर निकला । शहर का नज़ारा देखते ही बनता था ।
यहाँ के लोगो में अतीति आदर भाव और अच्छे विचार है । कहते है ना जहा की माटी में जादू हो वहाँ के लोगो में भी जादू होता है और वो मैंने देखा है ।

काम खत्म करके मुझे गोवा जाना था तो मैंने तय किया मंगलोर होके जाएंगे । और वाकई में मेरा निर्णय बहुत सही रहा ।
तो तकरीबन 4 बजे चिकमगलूर से निकला । बस अपनी रफ्तार से चल रही । खुशकिस्मती से मुझे खिड़की की सीट मिली ,जहां से मुझे कई नज़ारे देखने को मिले ।

सड़कें बहुत अच्छी है कर्नाटक में ,

चिकमगलूर से निकलते ही रास्ते में इतने मोड कि बस चालक पल  पल बस का स्टेरिंग  दायें से बाए मोड़ रहा था । घुमावदार सड़क और सड़क के किनारे ऊंचे ऊंचे पहाड़ ,पहाड़ों पर हरियाली और बड़े बड़े पेड़ कहीं बहते पानी के छोटे छोटे नाले और आसपास कॉफी के बागान ,हल्की हल्की बारिश .... वाह बहुत ही अढ्भुत नज़ारा आंखे भी पलकें झपकाना भूल गयी ।

1 घंटे की दूरी तय कर कोट्टिगेरा  पहुंचा ।
यहाँ कॉफी का आनंद लिया ,बहुत ही स्वादिष्ट कॉफी और वाकई में इस कॉफी में इस क्षेत्र की खुशबू महसूस होती है ।

असल सफर अब शुरू हुआ ....
जब कोट्टिगेरा  से बस चली तो कुछ देर बाद कुछ अलग ही नज़ारे देखने को मिले रास्ता वही गुमावदार ....... पर जो नज़ारे देखे ..... नज़ारे थम गयी ....
बस ऊंचे पहाड़ पर घुमावदार रास्ते पर चल रही थी .... और मेरी धड़कन बढ़ रही थी ।
एक तरफ ऊंचे पहाड़ ,ऊंचे पेड़ ,हरियाली और झरनों से कलकल बहता पानी मन को मोहित कर रहा ,वही दूसरी तरफ झकते ही ...... धड़कन थम सी जाती ... ऐसा लग रहा मानो धरती यही खत्म हो गई इसके बाद कुछ भी नहीं है ,

बादल इन पहाड़ों के झुंड के बीच केद ,नीचे झाँको तो कुछ नज़र ही नहीं आता । मानो दुनिया यहीं खत्म हो गई ,,,,,,और बस की रफ्तार से दिल की धड़कन दोगुनी हुए जा रही थी ।

मैंने बादलों को छूआ .... महसूस किया बादलों का सामना किया .......ठंडी सर्द हवा ..... एक अलग ही दुनियाँ का अहसास करा रही थी । बहते झरने .... बादलों की धुंध ...वो ऊंचे पहाड़ और सीलन लगे पेड़ .... 2 घंटे का ये मेरा अढ़्भुत सफर #ujire तक रहा ....


बहुत ही अच्छा अनुभव रहा मेरा इस सफर में ....फिर से जाना चाहूँगा ...